Thursday, 24 October 2013

शहजादे की कहानी...

मां ने कहा आज तुम अपनी कहानी सुनाओ। इसलिए आज मैं अपनी कहानी सुनाऊंगाः शहजादा

अब आते हैं अंदर की खबर पर। असल मा मइया ता बहुतै डर गई रहैं। जैसे ही शहजादे ने आकर बोला कि मां ये रही कल के भाषण की स्क्रिप्ट, वैसे ही मां का चेहरा पीला पड़ गया और मां ने कहा, देख लाडले, तू कल कुछ भी बोलना बस ये मत बोलना कि मां रोई थी। तू लिखवा के कुछ ले जाता है, और नाम वहां मेरा ले लेता है। तूने मुझे कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा रे पगले। अब तो मेरा नाम ही रोनिया गांधी पड़ गया है। मीटिंग से उठकर वॉशरूम भी चले जाओ तो पार्टी सदस्य सोचने लगते हैं कि क्या मैडम रोने गई हैं।

इसलिए लाडले, तू दादी, पापा, चाचा, मामा, मौसा, नौकर, चाकर, डॉगी, पूसी..किसी का भी नाम ले लियो लेकिन बस मेरा नाम न लियो। और क्या ही अच्छा हो कि तू अपनी ही कहानी सुना दे। मेरी कहानी तो तूने बहुत सुनाई। अब कुछ अपनी भी बता दे। मेरे आंसू तो बहुत निकाले, अब कुछ अपने भी बहा दे। शहजादे के दिमाग की घंटी बज गई और उसको मां की ये बात जम गई। बस, फिर क्या था, उसने आव देखा न ताव और लिखवा डाली महास्क्रिप्ट। एकता कपूर इस बार डबल सकतिया गई हैं। पिछली बार तो शहजादे ने ट्विस्ट एंड टर्न के मामले में एकता को टक्कर दी थी, इस बार तो इमोशंस का वो पनाला बहा दिया कि एकता के सीरियल्स के सारे इमोशन मिलकर भी इस पनाले का मुकाबला न कर पाएं। सुना है कि घबराकर एकता उस इंसान को ढूंढ़ रही हैं जो शहजादे की स्क्रिप्ट लिखता है। अगर वह मान गया तो ठीक नहीं तो एकता अपने लिए कोई साइड बिजनस प्लान कर लेंगी।

अब जैसा कि हमेशा होता है, शहजादे के पास केवल अपने बारे में तो बताने को तो कुछ खास था नहीं, इसलिए स्क्रिप्ट राइटर ने स्क्रिप्ट को दमदार बनाने के लिए इसमें उनके पापा और उनकी दादी नामक पंच डाल दिया। रचनाकार ने भावनाओं के धागे में घटनाओं को पिरोकर शहजादे की कहानी का जो ताना-बाना बुना, उससे तो सबकी आंखें लबलबा आईं। इस लबलबाहट के बीच उन हजारों लोगों की वह बौखलाहट कहीं दब कर रह गई जिन लोगों के अपने शहजादे के अपनों की वजह से अपने अपनों से बहुत दूर चले गए थे। शहजादे की दादी की हत्या हो तो उसका दुखी होना बनता है। शहजादे के पापा की हत्या हो तो भी उसका दुखी होना बनता है। लेकिन वे हजारों लोग क्यों दुखी हों जिनके अपने खुद उस शहजादे के अपनों के दुख की प्रतिक्रियास्वरूप मारे गए थे। भई वे तो छोटे-मोटे झाड़-झंखाड़ हैं न, जिनको किसी बड़े दरख्त के गिरने पर दब ही जाना होता है, मर ही जाना होता है।

और झाड़-झंखाड़ भी क्यों, कीड़े-मकौड़े कहो, जो आपके अपनों के इमोशंस के पनाले में बहकर कहां चले जाते हैं किसी को पता भी नहीं चलता। उनके अपनों को कहां ये डर सताता है कि कल को वे भी मर गए तो? असल में उनके पास इस डर को देने के लिए समय ही कहां है। वे अपनी दो रोटियों के जुगाड़ में इतने व्यस्त रहते हैं कि मौत आती भी है तो उससे ठीक से मिल भी नहीं पाते और मरने के बाद भी जिंदा रह जाते हैं, अपने जैसे ही दूसरे अपनों में, जिनके कंधों पर उनके अपनों की जिम्मेदारी उतर आती है। आपके अपने मरते हैं तो आपको बहुमत की जीत दे जाते हैं। क्योंकि आपके अपने इस देश की जनता को भी इमोशनल कर जाते हैं। आपके अपने की एक मौत, बाकियों के अपनों की हजारों मौतों पर भी भारी पड़ जाती है। आपके अपने की मौत से आपकी राजनीति चमक जाती है। बाकियों की तो पूरी जिंदगी ही उनके अपनों की मौत को जीने में गुजर जाती है।

दूसरी पार्टियां लोगों को आपस में लड़वाती हैं, इसलिए आप उनसे खफा हैं। आपकी पार्टी सही है, लोगों को लड़वाती नहीं, सीधे मरवा देती है। लोगों को इस जीवन से मुक्त करना हो तो आपकी पार्टी के कर्मठ कार्यकर्ता सहर्ष मुक्ति प्रक्रिया की जमीन तैयार करने के लिए पहुंच जाते हैं। फिर इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि यह प्रक्रिया आपकी पार्टी के सिंहासन वाले राज्य में होनी है या किसी और राज्य में। वे कहीं, कोई भेदभाव नहीं करते। और महानता तो देखो, इस मुक्ति का खुद श्रेय भी नहीं लेते, सब दूसरी पार्टी के अपने सहयोगियों में बांट देते हैं।

लोगों की यह मुक्ति उनके जिन अपनों को जीवन भर के लिए बांध जाती है, उनके पास तो जी भर के रोने का भी समय नहीं होता। पता है क्यों? क्योंकि उनको फिकर जो करनी होती है। फिकर अपनी आगे की जिंदगी की, जिसे किसी अपने की मौत से उपजी लड़खड़ाहट के बाद फिर खड़ा करना है। क्योंकि अपनी मौत आने तक कैसे भी करके उन्हें जिंदा जो रहना है। दुख तो आप जैसे मनाते हैं, क्योंकि आपके पास वंश है, आपके पास उपनाम है। आपके पास ही तो दुख-सुख मनाने का काम है। आपकी इस व्यस्तता को ससम्मान समर्पित दो लाइनें:

उन्हीं के खून का मरहम तुम्हारे घाव भरता है,
तुम्हारी बात पे मिटने को ये सारा जमाना है।
उनका तो पेट है पापी, तुम्हारी राजनीति है,
तुम्हें बस्ती जलानी है, उन्हें चूल्हा जलाना है...

Source - Trapti (NBT)

Thursday, 10 October 2013

सचिन के संन्यास से सूना क्रिकेट...

  उनके शतक के इंतजार में भारत में जिंदगी रुक सी जाया करती थी। उनकी एक झलक पाने के लिए हजारों लोग घंटों लाइन लगाकर भी बिना किसी शिकन के स्टेडियम जाने को तैयार रहते थे। उनकी बेहतरीन बैटिंग देखने के लिए स्कूल-कॉलेज और ऑफिस से छुट्टी ले लेना आम बात थी। पूरा देश उनकी तरफ इस उम्मीद से निहारता था कि कैसी भी परिस्थियां हो और सामने कितनी भी खतरनाक टीम या गेंदबाज हो सिर्फ यही बल्लेबाज इस देश को जीत दिला सकता है।
करोड़ों हाथ उनके लिए एक साथ दुआएं मांगते थे। करोड़ों आंखें और कान टेलीविजन और रेडियो से उनके शतक बनने और भारत को जीत दिलाने का इंतजार करते रहते थे। इतनी सारी उम्मीदों का दारोमदार सिर्फ एक शख्स पर था, जी हां सही पहचाना आपने उस खिलाड़ी का नाम है सचिन तेंडुलकर। साल 1989 में जब से 16 साल की उम्र में सचिन ने भारत के लिए क्रिकेट खेलने की शुरुआत की तब से लेकर अब तक यानि की पिछले 24 सालों से वह करोड़ों लोगों की उम्मीदों को अपने कंधों पर बाकायदा ढोते आए हैं।

फिलहाल यह उम्मीद और इंतजार अब खत्म होने को हैं। नवंबर में अपना 200वां टेस्ट खेलने के साथ ही सचिन टेस्ट क्रिकेट से भी संन्यास ले लेंगे। अब न उनके फैंस को उनके शतकों का इंतजार होगा और न ही वह उम्मीदें। उनके फैंस अब किसी मैच में वैसा दबाव नहीं महसूस करेंगे जैसा वह पिछले दो दशकों से करते आए हैं। अब सचिन-सचिन का शोर भी नहीं सुनाई देगा। वजह अब उनमें सचिन नहीं होंगे। शोर, देशभक्ति, जज्बा क्रिकेट में अब भी कायम रहेगा। खेल यूं ही चलता रहेगा लेकिन एक बात तय हैं कि उनके जैसा खिलाड़ी भारत को अब और नहीं मिलेगा। ऐसे खिलाड़ी सदी में एक बार पैदा होते हैं।

सचिन ने जब से क्रिकेट खेलना शुरू किया वह खास बन गए थे। छोटी सी उम्र में नित नई ऊंचाइयां छूते हुए वह इस देश के सबसे लाडले खिलाड़ी बन गए। सिर्फ 16 साल में टेस्ट पदार्पण, 17 साल में टेस्ट शतक, 19 साल में विश्वकप खेलना। 100 अंतरराष्ट्रीय शतक, टेस्ट में 51 शतक, वनडे में 49 शतक, टेस्ट में 15 हजार रन, वनडे में 18 हजार से ज्यादा रन, अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में 50000 हजार से ज्यादा रन।  उनका सफर किसी परीकथा सरीखा लगता है। यकीन करना मुश्किल हो जाता है कि एक खिलाड़ी इतने सारे रेकॉर्ड कैसे बना सकता है।

यह जानकर कि सिर्फ दो टेस्ट मैच बाद हम फिर कभी इस महान खिलाड़ी को खेलते नहीं देख पाएंगे उनके फैंस का भावुक होना स्वाभाविक है। शायद ही कभी क्रिकेट को उनके जैसी प्रतिभा वाला खिलाड़ी मिले। उनको खेलते देखते हुए जवान हुई पीढ़ी को उनकी बैटिंग को और न देख पाने का मलाल हमेशा रहेगा। उनकी बैटिंग की यही खासियत थी कि वह चाहे पहली गेंद का सामना कर रहे हों या शतक के करीब हों या दोहरा शतक जमा चुके हों आप कभी भी उनकी बैटिंग से बोर नहीं होते थे। उनके बैटिंग में हमेशा वही पैनापन वही ताजगी नजर आती था। उनका बैटिंग के जादुई आकर्षण से खुद को बचा पाना नामुकिन था।

उनके फैंस उन्हें कभी रिटायर होते नहीं देखना चाहते थे। सचिन को जितना प्यार इस देश और क्रिकेट के फैंस से मिला उतना तो सर डॉन ब्रेडमैन को भी नहीं मिला। उनके फैंस इसीलिए उन्हें क्रिकेट के भगवान का दर्जा देते थे, जिसके लिए कुछ भी असंभव नहीं था। कई लोगों ने सचिन के लिए ही क्रिकेट देखना शुरू किया और सचिन के संन्यास के बाद शायद ही वे क्रिकेट को देखें या उससे उतना ही जुड़ाव महसूस करें। उनके लिए क्रिकेट का मतलब सिर्फ सचिन तेंडुलकर है। उनके फैंस तो यही चाहते थे कि वह कभी रिटायर ही न हों और हमेशा खेलते रहें।

इस खिलाड़ी की खासियत य़ह है कि उन्हें देखकर और आदर्श मानकर न सिर्फ इस देश से और भी कई बेहतरीन क्रिकेटर निकले बल्कि उन्हें आदर्श मानने वाले युवाओं ने उनकी लगन, अनुशासन और प्रतिबद्धता को आदर्श मानकर समाज के कई दूसरे प्रोफेशन में भी नाम कमाया। उनकी विनम्रता, क्रिकेट के लिए जुनून, देश के लिए प्यार, कड़ी मेहनत, अनुशासन इन सबका दूसरा उदाहऱण मिलना बहुत मुश्किल है।

एक लेख में उनके पूरे क्रिकेट करियर की यादों को समेट पाना नामुमकिन हैं। फिर भी बहुत सी यादें एकसाथ आ रही हैं। महज 16 साल की उम्र में महान अब्दुल कादिर की लगातार 4 गेंदों पर छ्क्के लगाना, 1992 में पर्थ और सिडनी में ऑस्ट्रेलिया के महान गेंदबाजी आक्रमण के सामने सिर्फ 19 साल की उम्र में बेहतरीन शतक जड़ना, न्यूजीलैंड के खिलाफ वनडे में सिर्फ 49 गेंदों में 84 रन की पारी, 1996 के वर्ल्ड कप में दो शतकों के साथ सिर्फ 7 मैचों में 523 रन ठोक डालना,वर्ष 1998 में शारजाह में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ दो शतकों के साथ भारत को खिताब दिलाना,  उसी साल 9 वनडे शतकों के साथ एक ही साल में 1894 वनडे रन बनाना, पाक के खिलाफ 1999 में चेन्नै में 136 रन की पारी, उसी साल पिता के निधन के बाद भी कीनिया के खिलाफ शतक, साल 2011 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ चेन्नै में शानदार शतक, 2003 के विश्वकप में शोएब अख्तर की गेंद पर छक्का, उनका 100वां शतक। ये तो छोटी सी लिस्ट भर है इस महान खिलाड़ी के कारनामों की। उनकी महानता की कहानी कहीं ज्यादा बड़ी है।

उनके संन्यास के साथ ही भारत एक महान खिलाड़ी की सेवा से वंचित हो जाएगा। इतने लंबे समय क्रिकेट की सेवा करने के लिए हम उनके आभारी रहेंगे। हम सौभाग्शाली हैं कि सचिन हमारे युग में खेले, आने वाली पीढ़ियां खुद को इस बात के लिए कोसेंगी क्यों वह सचिन को खेलते हुए नहीं देख पाए। सचिन के संन्यास से निस्संदह उनके लाखों प्रशंसकों के मन ने कहीं न कहीं क्रिकेट से थोड़ा ही सही संन्यास जरूर ले लिया है। आपको सैल्यूट सचिन!

Wednesday, 9 October 2013

Paap dhone k 9 din...

आप पढ़ना शुरू करें, इससे पहले मैं बता दूं कि इस पोस्ट में जिन कर्मों का जिक्र किया गया है, वे अगर आप नहीं करते तो यह टिप्पणी आपके लिए नहीं है। जो लोग सालभर परोपकारी और सदाचारी जीवन जीते हैं, उन पर टिप्पणी नहीं की जा रही है। और आपसे बेहतर यह कौन जानता है कि आप किस श्रेणी में आते हैं।

तो हे भक्तजनो, तैयार हो जाइए... नवरात्र का मौसम आ गया है... फटाफट देवी की उपासना में डूब जाइए... आपके लोक परलोक सुधर जाएंगे। पूरे साल इतने पापकर्म किए हैं, दुष्टताएं की हैं... सब धुल जाएंगे। व्रत रखिए, कन्याओं का पूजन कीजिए, देवी की बड़ी-बड़ी मूर्तियां स्थापित कीजिए और वहां जोर-जोर से डीजे चलाइए, फिल्मी धुनों पर बने भजन सुनिए, कूद-कूद कर डांस कीजिए देवी आपसे अत्यन्त प्रसन्न होंगी और धन-धान्य और सुखों से आपके जीवन को भर देंगी। पूरे साल डट के मांस खाइए, अंडे भसकिए, मदिरा की बोतलें खाली कीजिए लेकिन बस ये नौ दिन अपने पर काबू रख लीजिए आखिर साल भर के पाप धोने हैं कि नहीं?

आप बिलकुल चिन्ता न करें! पूरे साल जम के गर्भ परीक्षण कराएं और बच्चियों को पैदा होने से पहले ही गर्भ में मारते रहिए। गलती से पैदा हो जाएं तो उनको लड़के से आधा खाना देना नहीं भूलिए। और उसे कुछ खास पढ़ाने-लिखाने की जरूरत नहीं है उसे बस शादी के हिसाब से पालिए। उसकी जिन्दगी का परम लक्ष्य यही है कि वो जवान हो, उसकी शादी की जाए, बच्चे पैदा करे, घर संभाले और फिर एक दिन मर जाए।

आराम से पूरे साल बलात्कार करते रहिए, छेड़खानी करते रहिए, अभद्र टिप्पणियां करना भी नहीं भूलिए, घूरना तो खैर आपका जन्मसिद्ध अधिकार है उसे कभी मत छोड़िएगा। मां-बहन की गालियां बेझिझक दीजिए, घरों से लेकर स्कूलों तक नन्ही बच्चियों से युवतियों तक का शोषण जारी रखिए। कोर्इ चिन्ता मत कीजिए आप कुछ भी कर लें नवरात्र में जब आप देवी की उपासना करेंगे तो आपके सब दुष्कर्म माफ हो जाएंगे और आप सीधे बैकुण्ठ लोक में जाएंगे।

महिलाओं से भी मेरा निवेदन है कि आपकी पड़ोस में, घर-परिवार, जान-पहचान में किसी महिला पर अत्याचार हो रहा हो तो आप चुप्पी मार जाएं। किसी का पति उसकी धुनार्इ कर रहा हो, किसी विधवा को उसके घर से बेदखल किया जा रहा हो या किसी बूढ़ी मां को उसके बच्चे वृंदावन या हरिद्वार छोड़ने की तैयारी कर रहे हों तो ध्यान रखें ये उनका निजी मामला है। घर के अंदर आकर एक बार दुर्गा स्त्रोत्र पढ़ लें देवी स्वयं देख लेंगी कि क्या करना है।

अगर आपका लड़का किसी से छेड़खानी करके आए तो मुस्करा कर उसका स्वागत करें आखिर उसका समुचित विकास हो रहा है और उसकी सभी अन्त:श्रावी ग्रंथियां सही ढंग से हारमोनों का रिसाव कर रही हैं और उसके अंग-प्रत्यंग सुचारु रूप से काम कर रहे हैं। आज छेड़खानी करेगा तभी उसका भविष्य उज्जवल होगा और वो एक अच्छा पति और पिता बनेगा।

अगर आपके साथ भी किसी तरह का अत्याचार हो रहा है तो उसका विरोध नहीं करें बस दुर्गा शप्तसदी का पाठ करें आपके सब संकट दूर हो जाएंगे। नहीं हुए तो आप समझ लेना कि ये पूर्व जन्म के पापों का दंड है और उसे खुशी-खुशी बर्दाश्त कर लेना।

अगर आप ज्यादा ही बोर हो रही हों और आपके आस-पास कोर्इ आपकी नहीं सुन रहा हो तो सच्चे मन से देवी को याद कीजिए और उनसे कहिए कि वो आपके ऊपर चढ़ जाएं। एक बार देवी आप पर चढ़ गयी तो आपके आस-पास वालों की बोलती बंद हो जाएगी, गाली देने वाली सास के मुंह से फूल झड़ेंगे, गुर्राने वाला पति मिमयाने लगेगा और अगर आप शादीशुदा नहीं हैं और आपका बॉयफ्रेंड किसी और लड़की को लाइन मार रहा है तो यकीन मानिए वो आपके चरणों में गिर पड़ेगा।

और हां! विजयादशमी के लिए अभी से ट्रक, डीजे, टैम्पो, शराब, गुलाल वगैरह का इंतजाम कर लीजिएगा। खूब नाच-गाने, मौज-मस्ती के साथ देवी की मूर्तियों का नदियों में विसर्जन करना है। गणेश की बदहाल मूर्तियां इंतजार कर रही होंगी कि कब देवी आएं और हम उन्हें अपना दुखड़ा सुनाएं| 
from
Sanjeev sharma..