Tuesday, 13 August 2013

BoL..

कन्फ्यूसियस ने कहा है -‘शब्दों को नाप तौल कर बोलो, जिससे तुम्हारी सज्जनता टपके।‘

भारतीय दार्शनिक जे. कृष्णमूर्ति ने कहा है-‘कम बोलो, तब बोलो जब यह विश्वास हो जाए कि जो बोलने जा रहे हो उससे सत्य, न्याय और नम्रता का व्यतिक्रम न होगा।‘ इसलिए बोलते समय सतर्क रहना चाहिए..
फ्रांसीसी लेखक कार्लाइल ने कहा है कि मौन में शब्दों की अपेक्षा अधिक वाक्शक्ति है।

गांधीजी ने भी मौन को सर्वोत्तम भाषण कहा है।

सुकरात कहा करते थे-‘ईश्वर ने हमें दो कान दिए हैं और मुंह एक, इसलिए कि हम सुनें अधिक और
बोलें कम।‘

किंतु व्यावहारिक जीवन में सदा मौन रहना संभव नहीं है इसलिए संत कबीर ने बोलते समय मध्यम मार्ग अपनाने का सुझाव दिया है -अति का भला न बोलना, अति की भली न चुप /अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप.

वाणी का अत्यधिक उपयोग प्रायः विकार उत्पन्न करता है। इसलिए संयमित वाणी को विद्वानों ने अधिक महत्व दिया है।बोलना और प्रभावशाली बोलना, एक कला है। इस कला में माहिर होने के लिए कुछ प्रयास करने पड़ते हैं।

Thursday, 8 August 2013

Haryanwi Jokezz

सरद-गरम
एक ब एक ताऊ, कसुता उत , अपणे बड़े छोरे के शहर में नए बनाये ओड़ घर में गया अर रात ने बहार बरामदे में खाट गाल के सोगा ! कित जक पड़े थी ! 

अपने छोरे ते रुका मारया - र मन्ने जाड़े में मारोगे के ? छोरे ने उसकी खाट भीतर गाल दी ! 

कोन्या डटया गया ! फेर रुका मारया - अर ! मन्ने गर्मी में मारोगे के ? 

छोरे ने फेर ताऊ की खाट धेल ते आधी बहार अर आधी भीतर घाल दी !

ताऊ के फेर कुचरनी उठी अर मारया रुका -- अर कसाई मन्ने सरद-गरम करके मारोगे के !
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आलू एंड  गोभी

सुरजा फ़ौज मैं था, साल भर पाच्छै छुट्टी आया । सांझ-नैं उसकी बहू रामप्यारी बूझण लाग्गी अक आज कुण-सा साग बणाऊँ ?
सुरजा बोल्या - आलू एंड (and) गोभी रांध ले ! अर इतणा कह कै बाहर गाम मैं घूमण लिकड़-ग्या ।
रामप्यारी सोच मैं पड़-ग्यी - के घरां आलू बी सैं , गोभी बी सै । पर यो एंड (and) के होया ?
रामप्यारी अपणी पड़ोसण धोरै बूझण गई । पड़ोसण नैं बी कोणी बेरा था अक यो एंड के हो सै । उसनै सोची अक ना बताई तो रामप्यारी आगै बेजती हो ज्यागी !
पड़ोसण बोल्यी - एंड तो गोबर हो सै ।

बस, फेर के था ! रामप्यारी नै घरां आ-कै गोबर का छ्यौंक ला-कै साग बणा दिया ।
रोटी खाते टेम सुरजा बोल्या - आज तो सब्जी चरचरी बण रही सै !
रामप्यारी बोल्यी - एंड किमैं घणा पड़-ग्या होगा !!!
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भागदौड़

जंगल म्ह राजा का चुनाव होया अर उसमैं बांदर जीत ग्या। बांदर का राजा बणना शेर तै बर्दाश्त कोनी होया। इस छोंह म्ह वो बकरी के बच्चे नै ठा लेग्या। 
बकरी बांदर धौरे आई अर रोंदी-रोंदी बोल्ली – राजा साब शेरे मेरे बच्चे नै ठा के लेग्या थाम उसती बचा ल्यो। 
बांदर एक पेड़ तै दूसरे पेड़ पै छाल मारण लाग्या। 
बकरी बोल्ली – जी थाम तोले से जाओ इतणे म्ह तो वो शेरे मेरे बच्चे नै खा जावैगा। 
बांदर बोल्या – न्यूं खावैगा तो खावैएगा मेरी भागदौड़ मैं कमी हो तो बता !!
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कुत्ते की निगाह

एक बार एक ताऊ पैदल आपणे गांव जावै था
रास्ते में उसके जूती पाँ में काटण लाग गी और ताऊ नै जूतियां आपणी लाठी पै टांग ली और चाल पड़ा गाम नै |
गांम में सुंडू ने देख लिया ताऊ, जूती टाँगे आता हुआ और 
सुंडू नै मजाक करण की सुझी बोल्या - ताऊ, परांठे बहुत दूर टांग राखे सै
ताऊ भी कम ना था, ताऊ बोल्या - भाई खाण-पीण की चीज़ कहीं भी टांग ल्यो
सुसरे कुत्ते की निगाह वहीं चली जा |

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दिल्ली
एक बे ,समरू का इंटरव्यू आग्या आर वो कंडीडेट तें बुझण लाग्ग्या अक रे तेरे पे के बुझी ? वो बोल्या अक नक़्शे में दिल्ली बुझी थी समरू रट्टा मार के ने भीतर बडगया ।इम्प्लायर ---- समरू बताओ गंगा कहाँ हे ?
समरू ---- दिल्ली बुझ ले ने ,गंगा में के डूब के ने मरेगा ?
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काच्ची जूती
एक बार एक ताऊ की जूती तंग थी तै वो लंगडा कई चाले था एक मेरे बर्गा छोरा बोला ताऊ कित तै लाया ये जूती ??????
ताऊ क छो उठ गया वो बोल्या झाडी पै तै तोड़ कई लाया सूं

तै वो छोरा बोल्या के ताऊ तगाजा कर गया अर तू तै जूती काच्ची ए तोड़ लाया
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पहलवान

एक पहलवान गनहा कसूता तगड़ा |उसकी खूबी भी के अक ज वो कान पकड़ लिया करता ना त छोडया नहीं करता |

एक बोधा सा छोरा बोलया उसते की भाई म शर्त मारू हु तेरी गेल | पहलवान बोलया ठीक स भाई तू मार ले शर्त, उस छोरे ने शर्त मारी 10 रपिया की |

पहलवान बोलया की ज कान छुटाया गया त तेर त 10 रपिए मै दे दूंगा नहीं त तन्ने देने पड़ेंगे 10 रपिए , छोरा बोलया ठीक स
उस छोरे ने उस पहलवान त पकड़वा दिया कान, उस छोरे ने आँख मीच के न हाँगा ला के न मारया ज़ोर, पतला सा त था ए भाज लिया छूटा क, वो बोधा छोरा बोलया ले न तेरा फूफा यो छूटा गया 10 रपिए दे |

पहलवान बोलया ले भाई 10 रपिए अर यो कान भी ले ज्या ... 
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काला आदमी

एक भरपूर काला आदमी जुकाम की शिकायत लेकर डॉक्टर के पास गया। डॉक्टर ने उसे सरसरी निगाह से देखकर कहा कि वो अपने कपड़े उतार दे और दोनों हाथों को जमीन पर टिका दे!
आदमी हैरान परेशान पर उसने यह किया!
ठीक है- डॉक्टर बोला.. अब जानवरों की तरह चलिए, और कमरे के दायें कोने में जाए..
आदमी ने यही किया..
ठीक - डॉक्टर साहब बोले- अब बाएं कोने में जाएं..
बंदा उधर चला गया!
अब इस कोने में, अब उस कोने में, अब सामने, अब बीच में..
आदमी घबरा के उठ खड़ा हुआ.. डॉक्टर साहब, कोई गंभीर बीमारी तो नहीं हो गयी मुझे?
अरे नहीं- डॉक्टर साहब बोले. मामूली जुकाम है, ये दो गोली लो सुबह तक ठीक हो जाओगे..
पर डॉक्टर साहब आपने ये मेरा एक घंटे तक इस तरह परीक्षण क्यों किया..
कुछ नहीं यार- डॉक्टर साहब बोले.. बात यह है कि मैंने एक काले रंग का सोफा खरीदा है, मैं देखना चाहता था इस कमरे में वो किस जगह ठीक दिखेगा! 

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चौधरण मर ली !

एक बै एक जाट भाई अपनी एक नई रिश्तेदारी में चल्या गया, साथ में उसका नाई भी था । नई रिश्तेदारी थी, खातिरदारी में फटाफट गरमा-गरम हलवा हाजिर किया गया । दोनूं सफर में थक रहे थे, भूख भी करड़ी लाग रही थी ।
हलवा आते ही दोनूंआं नै चम्मच भरी और मुंह में गरमा-गरम हलवा धर लिया । ईब इतना गरम हलवा ना निगल्या जा और ना बाहर थूक्या जा ! बुरा हाल हो-ग्या, आंख्यां में आंसू आ-गे ।
नाई ने हिम्मत करी और बोल्या - "चौधरी, के हुया ?"
जाट बोल्या - "भाई, जब घर तैं चाल्या था, तै थारी चौधरण बीमार सी थी, बस उस की याद आ-गी" ।
नाई की आंख्यां में भी पाणी देख कै जाट बोल्या - "ठाकर, तेरै के हुया ?"
नाई बोल्या - चौधरी, मन्नै तै लाग्गै सै चौधरण मर ली !
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“तीन फेरे भतेरे”
एक बै बनिया की छोरी के ब्याह में फेरे करवावण खातिर कोई बाहमण ना मिल्या । जब कित्तै तैं बाहमण का जुगाड़ ना हुया तै छोरी आळे एक जिम्मेदार जाट नै ले आये । जाट नै फेरे शुरु करवा दिये ।
तीन फेरे होण पाच्छै जाट बोल्या - भाइयो, रस्म तै पूरी हो-गी, छोरी की विदा करवाओ ।
छोरे आळे बाराती बोले - जी, फेरे तै सात होया करैं ।
जाट बोल्या - भाई, बात इसी सै, जै (अगर) उसनै रुकणा होगा तै तीन फेरयां में भी कित्तै ना जावै । अर जै इसनै भाजणा ए सै, तै चाहे पच्चीस फेरे करवा ल्यो !!
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Tuesday, 25 June 2013

स्वयं का सामना..

     कभी सोचा है कि व्यक्ति को सबसे अधिक भड़भड़ाहट कब होती है, सर्वाधिक मन कब ऊबता है, कौन सा समय वह शीघ्रातिशीघ्र बिता देना चाहता है? उत्तर अधिक कठिन नहीं होगा, यदि जीवन के भारी कष्टों को सूची से हटा दिया जाये तो सबसे अधिक कष्ट में व्यक्ति तब होता है जब वह एकान्त में होता है, शारीरिक रूप से, मानसिक रूप से।

कभी सोचा है कि व्यक्ति स्वयं से इतना क्यों भागता है? एकान्त काटने को दौड़ता है। कुछ तो कारण होगा कि हम स्वयं को ही नहीं झेल पाते हैं।

कहीं पढ़ भी रहा था कि जेल में यदि किसी व्यक्ति को कठिनतम दण्ड दिया जाता है तो उसे एकान्त में रख देते हैं, तनहाई कही जाती है वह। वह एकान्त ऐसा होता है जहाँ बन्दी का मानसिक संतुलन तक बिगड़ जाता है। क्या एकान्त में रहना हमारी प्रकृति के विरुद्ध है? व्यक्ति को स्वयं से भय क्यों?

ये प्रश्न ऐसे हैं जो उठते तो हर एक के मन में हैं, पर उनका उत्तर पाना उतना ही कष्टकर होता है जितना एकान्त में समय बिताना। कोई इसे मन का खेल मानता है, कोई सामाजिकता को दोष देता है, कोई इस पर कुछ कहना ही नहीं चाहता है। एकान्त सदा ही दोषपूर्ण माना जाता है, जो लोग किसी और से घुलते मिलते नहीं, उन्हें संशय और विस्मय की दृष्टि से देखा जाता है, विचित्र प्राणी की तरह।

माना कि एकान्त भयावह है, माना कि एकान्त असामाजिक है, पर अपने से पूर्णतया विमुख हो जाता कहाँ से आ गया हमारे अन्दर? अपने से भागने का गुण कहाँ से आ गया हमारे अन्दर? आश्रयों के हटते ही भरभरा कर ढहने लगता है हमारा जीवन। माना कि सहजीवन ही हमारी राह है, पर स्वयं को समझने और समझाने से क्यों विमुख हो जाते हैं हम? एकान्त को भयानक मानने वाली यह मानसिकता इतने गहरे धँसी है हम सबके अन्दर कि हम स्वयं से ही भागने लगे हैं।

यही प्रश्न संस्कृतियों के बीच की दीवार भी है, यही प्रश्न संस्कृतियों के बीच की सुलझन का प्रारम्भ भी है। पूर्व की संस्कृति में यह प्रश्न सदा से ही पूछा जाता रहा है, पश्चिम में यह प्रश्न सदा ही प्यासा रहा है। हमारा जीवनक्रम स्वयं को समझने से प्रारम्भ होता है और सहजीवन तक जाता है, पाश्चात्य सहजीवन को प्रमुखता से रख इस प्रश्न पर ठंडी राख उड़ेल देता है। जीवन दोनों संस्कृतियों में पल रहे हैं, एक पद्धति में अन्त तक स्पष्ट दिशा दिखती है, दूसरी पद्धति पगडंडियों के समाप्त होते ही भ्रमित हो जाती है। मैं जितना एकान्त में डूबता हूँ, उतना ही प्राच्य हो जाता हूँ, जितना सबके संग जीने लगता हूँ उतना ही पाश्चात्य का रंग धारण कर लेता हूँ। मैं बहुधा मुहाने पर खड़ा रहता हूँ, इस प्रश्न के कुछ इस पार, इस प्रश्न से कुछ उस पार।

स्वयं को जानना है तो स्वयं से जूझना भी पड़ेगा। कोई इसे भले ही अध्यात्म मान कर बुढ़ापे के लिये छोड़ दे, पर यह प्रश्न मुँह बाये एक न एक दिन खड़ा अवश्य हो जायेगा। कह देने भर से कि इन सबके बिना भी काम चल जायेगा, ये प्रश्न टलने वाले नहीं, उत्तर तो पाना ही पड़ेगा।

एक दूसरे को देखकर तो सब ही जीवन पार कर लेते हैं, पर क्या दूसरे का जीवन ही हमारा भी मानक हो जाये? क्या वे पद्धतियाँ जो किसी एक के लिये सुन्दर ढंग से चलती हैं, क्या दूसरे के ऊपर भी उतना ही प्रभावी हो सकती हैं? ऐसा नहीं है कि सारे लोग भेड़चाल में ही चलते हैं, कुछ अपनी राह स्थापित करते हैं, अपने मानक स्वयं स्थापित करते हैं। भौतिक सफलतायें अपना स्थान बनाती हैं, विकास होता रहता है, पर स्वयं को समझने का प्रश्न कार्य और उद्देश्यों की भीड़ में खोया ही सा रहता है।

अपने हृदय पर हाथ रखिये और पूछिये कि स्वयं से पहली बार वार्तालाप कब किया था, तब पता चलेगा कि तीन या चार दशक तो इस प्रश्न को पहली बार आने में ही निकल जाते हैं। जब तक प्रश्नोत्तरी तनिक रोचक होती है, आधा जीवन बीता हुआ सा लगता है। लगता है कि हम सदा ही स्वयं से भागते रहे, स्वयं का सामना करने से कतराते रहे।

एक परम स्नेही मित्र ने दर्शननिमग्न वार्तालाप के बीच एक दिन बड़े ही दुर्लभ वाक्य कहे, उनका कहना था कि जीवन में यदि किसी एक चीज को जानना आवश्यक है, तो वह स्वयं को। स्वयं को जानने के लिये मन को जानना आवश्यक है, आत्म मन से ही व्यक्त होता है।

बात सच भी है, हम सुख को ढूढ़ते रहते हैं। कहते हैं जो मन के अनुकूल है, वही सुख है। यदि हम मन को नहीं समझ पाये तब सुख को क्या समझ पायेंगे? बिना मन को जाने सुख की परिभाषायें बनाते रहते हैं, उस पर प्रयोग करते रहते हैं। मन को नयापन चाहिये तो उसे नयापन ला लाकर देते रहते हैं, पर बात तो मन के माध्यम से स्वयं को समझने की थी।

जो भी कारण हो, जो भी निदान हो, हम स्वयं से भागे लोग हैं, सदा ही बाहर अपना ठिकाना ढूढ़ते रहते हैं, व्यग्र हो। स्वयं में स्थिर होना सीख लें, तो जहाँ ठहर जायें, गाँव वहीं बन जाये हमारा, जहाँ रम जायें, वहीं राम हो जायें। यदि कहीं टिकना सीखना हो मुझे, तो स्वयं में ही, वर्तमान में ही, तात्कालिक परिवेश में ही।


विवेक गर्ग .. 

Thursday, 20 June 2013

Bol Bachan...



इन दिनों कई साधु महाराज चौक चौराहे पर प्रवचन देते मिल जाते हैं। सभी बताते हैं कि उनके पास अद्भुत शक्तियां हैं जिनसे वो भक्तों की किस्मत के ताले खोल सकते हैं। यहां तक कुछ संत यह भी कहते हैं उनके पास लोगों को भस्म करने की भी क्षमता है। लेकिन कोई ऐसा कोई संत या महात्मा नहीं जो उफनती नदियों के क्रोध को शांत कर सके।
जिस शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में बांध कर धरती पर आने के लिए विवश कर दिया था। आज उस शिव को गंगा के प्रचंड वेग से बचाने वाला कोई संत या साधु नहीं है। आज के जमाने के साधु संत इन्हीं की दुहाई देकर अपने भक्तों की संख्या बढ़ाने में लगे हैं। जबकि इतिहास में ऐसी कई घटनाओं का जिक्र मिलता है जब अपने तपोबल से ऋषियों ने नदी के प्रचंड वेग को शांत कर दिया या उनकी दिशा ही बदल डाली।
सबसे पहले जिक्र आता है महाराज भगीरथ का। उन्होंने अपने तपोबल से स्वर्ग में बहने वाली गंगा को पृथ्वी पर आने के लिए मजबूर कर दिया और गंगा को पृथ्वी पर आना पड़ा। अनमने मन से जब गंगा धरती पर आयी तो क्रोध में भरकर पूरी धरती को अपने वेग से निगलना शुरू कर दिया।
गंगा की प्रचंड धारा ने मार्ग में आने वाले ऋषि मुनियों के आश्रम को भी नहीं छोड़ा। जब गंगा ऋषि जाह्नु के आश्रम को भी बहाने लगी तब ऋषि ने अपने योग बल से गंगा की धारा को अपने कमण्डल में भर कर पी लिया। गंगा का अभिमान चूर हो गया और वो ऋषि के पेट से बाहर आने के लिए छटपटाने लगी।
विव‌श गंगा ने जब ऋषि से प्रार्थना की तब ऋषि जाह्नु ने गंगा को कान के रास्ते बाहर निकाल दिया। इसके बाद गंगा ऋषि जाह्नु की पुत्री जाह्नवी कहलाने लगी। इसलिए गंगा का एक नाम जाह्नवी भी है।
ऋषिकेश के पास सप्तधारा स्थित है। मान्यता है कि इस स्थान पर सप्तऋषि तपस्या कर रहे थे तभी गंगा यहां से गुजरी। लेकिन अब गंगा का अभिमान चूर हो गया था इसलिए ऋषियों को देखकर गंगा सात भागों में बंट गयी और सप्तऋषियों की तपस्या में बाधक नहीं बनी।

शंकराचार्य ने बदला नदी का रूखआठवी सदी में आदि शंकराचार्य का जन्म हुआ था। इन्होंने चार धाम की स्थापना की। इनकी मां नियमित रुप से पूर्णा नदी में स्नान करने के लिए लंबी दूरी तय करती थी। माता की परेशानी दूर करने के लिए इन्होंने अपने तपोबल और आध्यात्मिक शक्ति से पूर्णा नदी को अपने गांव के निकट ला दिया।
एक बार नदी में आई बाढ़ से गुरू आश्रम में पानी भरा जा रहा था। गुरू तपस्या में लीन थे। ऐसे समय में शंकराचार्य ने आश्रम की रक्षा के लिए आश्रम के द्वार पर अपना कमण्डल रख दिया। नदी का सारा जल कमण्डल में समा गया और आश्रम बाढ़ से बच गया।

ऋषि जिसने समुद्र को पी लियाकेदारनाथ मार्ग में एक ऋषि रहते थे। इनका नाम था अगस्त्य मुनि। एक बार कुछ असुर समुद्र में छुपे रहकर मुनियों को परेशान कर रहे थे। ये दिन में समुद्र में छिपे रहते और रात में बाहर निकलकर ऋषि मुनियों को परेशान करते। ऋषियों की परेशानियों को दूर करने के लिए इंद्र की प्रार्थना पर अगस्त्य मुनि ने समुद्र का पूरा पानी पी लिया था। 

Wednesday, 19 June 2013

In case you forget your protected excel sheet's password....

"If you lose or forget your password, it cannot be recovered. It is advisable to keep a list of passwords and their corresponding workbook and sheet names in a safe place."
If you do forget or lose your Excel password, however, all is not lost.

This macro can unprotect your workbook and assigns a new password. 
(It does not recover your original password.) You can find the macro below ... 


Dim i As Integer, j As Integer, k As Integer
  Dim l As Integer, m As Integer, n As Integer
  Dim i1 As Integer, i2 As Integer, i3 As Integer
  Dim i4 As Integer, i5 As Integer, i6 As Integer
  On Error Resume Next
  For i = 65 To 66: For j = 65 To 66: For k = 65 To 66
  For l = 65 To 66: For m = 65 To 66: For i1 = 65 To 66
  For i2 = 65 To 66: For i3 = 65 To 66: For i4 = 65 To 66
  For i5 = 65 To 66: For i6 = 65 To 66: For n = 32 To 126
     
        
 ActiveSheet.Unprotect Chr(i) & Chr(j) & Chr(k) & _
      Chr(l) & Chr(m) & Chr(i1) & Chr(i2) & Chr(i3) & _
      Chr(i4) & Chr(i5) & Chr(i6) & Chr(n)
  If ActiveSheet.ProtectContents = False Then
      MsgBox "One usable password is " & Chr(i) & Chr(j) & _
          Chr(k) & Chr(l) & Chr(m) & Chr(i1) & Chr(i2) & _
          Chr(i3) & Chr(i4) & Chr(i5) & Chr(i6) & Chr(n)
   ActiveWorkbook.Sheets(1).Select
   Range("a1").FormulaR1C1 = Chr(i) & Chr(j) & _
          Chr(k) & Chr(l) & Chr(m) & Chr(i1) & Chr(i2) & _
          Chr(i3) & Chr(i4) & Chr(i5) & Chr(i6) & Chr(n)
       Exit Sub
  End If
  Next: Next: Next: Next: Next: Next
  Next: Next: Next: Next: Next: Next



End Sub

Vivek Garg



Sunday, 16 June 2013

Joke..

एक भरपूर काला आदमी जुकाम की शिकायत लेकर डॉक्टर के पास गया। डॉक्टर ने उसे सरसरी निगाह से देखकर कहा कि वो अपने कपड़े उतार दे और दोनों हाथों को जमीन पर टिका दे!
आदमी हैरान परेशान पर उसने यह किया!
ठीक है- डॉक्टर बोला.. अब जानवरों की तरह चलिए, और कमरे के दायें कोने में जाए..
आदमी ने यही किया..
ठीक - डॉक्टर साहब बोले- अब बाएं कोने में जाएं..
बंदा उधर चला गया!
अब इस कोने में, अब उस कोने में, अब सामने, अब बीच में.. 
आदमी घबरा के उठ खड़ा हुआ.. डॉक्टर साहब, कोई गंभीर बीमारी तो नहीं हो गयी मुझे?
अरे नहीं- डॉक्टर साहब बोले. मामूली जुकाम है, ये दो गोली लो सुबह तक ठीक हो जाओगे..
पर डॉक्टर साहब आपने ये मेरा एक घंटे तक इस तरह परीक्षण क्यों किया..
कुछ नहीं यार- डॉक्टर साहब बोले.. बात यह है कि मैंने एक काले रंग का सोफा खरीदा है, मैं देखना चाहता था इस कमरे में वो किस जगह ठीक दिखेगा! 

जब मैं गावँ का सरपंच बना !


एक बार मुझे मेरे गाँव का सरपंच बना दिया गया।

गाँव वालो ने सोचा कि छोरा पढ़ा-लिखा है, समझदार है, यदि ये सरपंच बन गया तो गाँव की भलाई के लिए काम करेगा।
मौसम बदला, सर्दियों के आने के महीने भर पहले गाँव वालों ने मुझसे पूछा कि - सरपंच साहब इस बार सर्दी कितनी तेज पड़ेगी?
मैंने गाँव वालों से कहा कि मैं इसके बारे में आपको कल बताऊंगा।
मैं तुरंत ही शहर की ओर निकल गया, वहाँ जाकर मौसम विभाग में पता किया तो मौसम विभाग वाले बोले - " सरपंच साहब इस बार बहुत तेज सर्दी पड़ने वाली है।"
मैंने भी दूसरे दिन गाँव में आकर ऐसा ही बोल दिया।
गाँव वालो को विश्वास था कि अपने सरपंच साहब पढ़े लिखे हैं, शहर से पता करके आये हैं तो सही कह रहे होंगे। गाँव वालों की दृष्टि में मेरा सम्मान और बढ़ गया। 
तेज सर्दियाँ पड़ने की बात सुनकर गाँव वालों ने सर्दी से बचने के लिए लकडियाँ इक्कठी करनी आरम्भ कर दी।
महीने भर पश्चात जब सर्दियों का कोई नामोनिशान नहीं दिखा तो गाँव वालो ने मुझसे पुनः पूछा, मैंने उन्हें पुनः दूसरे दिन के लिए टाला और शहर के मौसम विभाग में पहुँच गया।
मौसम विभाग वाले बोले कि सरपंच साहब आप चिंता मत करो इस बार सर्दियों के सारे रिकॉर्ड टूट जायेंगे।
मैंने ऐसा ही गाँव में आकर बोल दिया। मेरी बात सुनकर गाँव वाले पागलों की तरह लकडियाँ इक्कठी करने लग गए।
इस प्रकार पंद्रह दिन और व्यतीत गए किन्तु सर्दियों का कोई नामोनिशान नहीं दिखा।
गाँव वाले पुनः मेरे पास आये। .मैं पुनः मौसम विभाग जा पहुंचा।
मौसम विभाग वालों ने फिर वही उत्तर दिया कि सरपंच साहब आप देखते जाइये कि सर्दी क्या प्रलय ढाती है ?
मैंने फिर से गाँव में आकर ऐसा ही बोल दिया।

अब तो गाँव वाले सारे काम धंधे छोड़कर केवल लकडियाँ ही इक्कठी करने के काम में लग गए।
इस प्रकार पंद्रह दिन और व्यतीत हो गए।

परन्तु सर्दिया आरम्भ नहीं हुई।
गाँव वाले मुझे कोसने लगे। 

मैंने उनसे एक दिन का समय और माँगा।
में तुरंत मौसम विभाग पहुंचा तो उन्होंने पुनः ये उत्तर दिया कि सरपंच साहब इस बार सर्दियों के सारे रिकॉर्ड टूटने वाले हैं।
अब मेरा भी धैर्य टूट चुका था। मैंने पूछा - आप इतने विश्वास से कैसे कह सकते हैं?

मौसम विभाग वाले बोले - " सरपंच साहब हम पिछले दो महीने से देख रहे हैं, पड़ोस के गाँव वाले पागलो की तरह लकडियाँ इक्कठी कर रहे हैं, इसका अर्थ सर्दी बहुत तेज पड़ने वाली है।